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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

फर्क देख लो

जब तक सबके लिए एक समान शिक्षा नीति लागू नहीं की जाएगी और जब तक गरीबों-अमीरों में भारी अन्तर पैदा करने वाली यह दोहरी शिक्षा नीति लागू रहेगी, तब तक गरीबों के साथ अन्याय होता रहेगा. नेता लोग आरक्षण का विरोध या समर्थन का ढ़ोंग तो करते नजर आते हैं लेकिन कोई नेता या अफसर अपने बेटा-बेटियों को सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ाता? क्या यह पक्षपात नहीं है?एक पहलवान और एक भूखे पेट गरीब की कुश्ती को कदापि न्याय नहीं कहा जा सकता है.
-सिद्धार्थ कौसलायन आर्य ग्रेटर नौएडा-भारत

(बीबीसी द्वारा छेड़ी गई एक बहस में शामिल होते हुवे)http://newsforums.bbc.co.uk/ws/hi/thread.jspa?sortBy=1&forumID=8570&start=15&tstart=0#paginator (साभार)

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

कैसी दुनिया कैसे लोग



18 अप्रैल के हिन्दुस्तान में खुशवंत सिंह साहब का लेख छपा था। खुशवंत सिंह ने चार हिंदू महिलाओं उमा भारती, ऋतम्भरा, प्रज्ञा ठाकुर और मायाबेन कोडनानी पर गैर-मर्यादित टिप्पणी की थी। फरमाया था कि ये चारों ही महिलाएं ज़हर उगलती हैं लेकिन अगर ये महिलाएं संभोग से संतुष्टि प्राप्त कर लेतीं तो इनका ज़हर कहीं और से निकल जाता। चूंकि इन महिलाओं ने संभोग करने के दौरान और बाद मिलने वाली संतुष्टि का सुख नहीं लिया है इसीलिए ये इतनी ज़हरीली हैं। वो आगे लिखते हैं कि मालेगांव बम-धमाके और हिंदू आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद प्रज्ञा सिंह खूबसूरत जवान औरत हैं, मीराबाई के अंदाज़ में रहती हैं। यानि अपनी पोती की उम्र की लड़की को भी खुशवंत सिंह भौंडी नज़र से देखते हैं। और तो और वो कृष्ण-भक्त मीराबाई को भी अपनी घिनौनी कामुकता के दायरे में ले आते हैं।


अतुल अग्रवाल


विस्फोट.कॉम में

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

जय हो

छठे वेतन आयोग में सरकारी सेवा में कार्यरत चपरासी को 15 हजार रुपये वेतन का वायदा किया गया है। एक राष्ट्र के रूप में क्या हम यह नहीं सोच सकते कि किसान की कम से कम इतनी आय तो हो जितना कि एक चपरासी वेतन पाता है? जब एक किसान परिवार की मासिक आय 2115 रुपये है तो नौकरशाहों और प्रौद्योगिकी के धुरंधरों को शर्म क्यों नहीं आनी चाहिए? यदि वे शर्मिंदा नहीं होते तो हमें उन्हें अपनी गलती स्वीकारने को बाध्य करना चाहिए.
देविंदर शर्मा का विश्लेषण
रविवार डट कॉम में
( आप की टिप्पणिया आमंत्रित है)

जूता बनाम इंडिया

7 अप्रेल 09 को गृहमंत्री पी चिदंबरं की प्रेस कान्फ़्रेंस देख रहा थी, एकाएक एक जूता उछला और उनके दाहिने कान के पास से होता हुआ निकल गया। यह इतना अचानक हुआ कि शायद ही वहां बैठे पत्रकारों को भी समझ में देर लगी होगी। लेकिन चिदंबरंम काफ़ी चौकन्ने थे। वे बचे भी और बेसाख्ता उनके मुहं से निकाला। इन्हें बाहर ले जाइए मैं इऩहें माफ़ करता हूं। आप यानी रानीतिक दल शायद यह सोचें कि चुनाव के चलते उऩ्होंने यह घोषणा की होगी। लेकिन उनकी वह तात्कालिक प्रतिक्रिया थी। जब ले जाया जारहा था तब उन्होंने दो बार अंग्रेज़ी में कहा आराम से ले जाएं। यानी ज़बरस्ती न करें। यहां एक सवाल तो यह उठता है कि वहां इंटेलिजेंस का पूरा अमला होगा। उनकी नज़र एक आदमी पर रहती है। पत्रकार अगली पंक्ति में बैठा था। जूता खोलने और फेंकने मे 5 नहीं तो 3 या 4मिनट तो लगे होंगे। अगर वे चौकस होते तो जूता फेंकने से पहले ही पकड़ सकते थे कम से कम घेर तो सकते ही थे। जब गृहमंत्री इतने असुरक्षित हैं तो आम आदमी तो किस्मत से ही जी रहा है।
-गिरिराज किशोर
अपने ब्लाग फिलहाल में

rajniti


कट्टरपंथी नेता और पूर्व आईपीएस अधिकारी सिमरनजीत सिंह मान के नेतृत्व वाले अकाली दल (अमृतसर) ने पत्रकार जरनैल सिंह को लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी का टिकट देने का प्रस्ताव दिया है।
मान ने सिंह को अमृतसर सीट से टिकट देने का प्रस्ताव दिया है। यहां से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को मैदान में उतारा है।
मान ने कहा, “जरनैल ने बहादुरी का एक बड़ा काम किया है। सिखों के साथ हुए अन्याय को रेखांकित करने के लिए सिंह ने जो काम किया, उस पर हम सभी सिखों को गर्व है।”


(इस ख़बर पर आपकी राय लिखे)

हम बोलेंगे तो बोलेंगे की बोलते है


वरुण को दोष देने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि इस तरह के बयान तो कई नेता देते रहे है. पर वरुण का बयान चुनाव के समय आया है. 2005 मे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने भी कहा था और तब वहाँ राजनाथ सिंह भी थे लेकिन लोगों को सज़ा अपने क़द के अनुसार मिलती है.वरुण ने जो कहा वह ग़लत है ही पर उससे भी ग़लत अब उस पर होने वाली राजनीत में होगा. कभी कविता लिखने वाले ये वरुण गांधी वह नहीं हैं जो भारत को एकजुट कर सकें.
DIPAK D। CHUDASAMA HYDERABAD


(बीबीसी में)


( photo : akhilesh bharos flickr ke chhattisgarh teg me)